शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

Train ka intzaar

कितना बुरा होता है
इस ट्रेन का इंतज़ार
पहले तो घर से निकलने कि जल्दी
ऊपर से ट्रेन के छूट जाने का डर
पहुच जाता हूँ जल्दी जल्दी में
मै वक़्त से पहले
और गहरी साँस लेता हूँ
अपनी घड़ी को तकता हूँ
अभी कुछ वक़्त है बाकी
नहीं निकला मेरा साथी
फिर होती है पूछताछ
कहाँ पे है मेरा संगी , कहाँ पे है मेरा साथी
पता चलता है फिर मुझको
उसे तो देर है बहुत
मै अपने वक़्त से पहले
वो अपने वक़्त से देर है बहुत
किस तरहं होता है है मेरे वक़्त का तिरस्कार
और कितना बुरा होता है इस ट्रेन का इंतज़ार
फिर होती है वहां से
वक़्त बिताने कि शुरुआत
और दिखते है मुझको
चलते फिरते नये नये किरदार
किसी को जल्दी है बहुत
तो कोई लेट हो गया
कोई है खिलखिला यहाँ
कोई मायूस हो गया
किसी का आने वाला है कोई
किसी का जाने वाला है
मै देखता हूँ हर चेहरा
मुझे अपना सा लगता है
मेरी ज़िन्दगी के हर पहलू मुझे आते है नज़र
मै खुद को याद करता हूँ
फिर उनको देखता हूँ मै
कभी मुझे भी जल्दी थी
कभी तो मै भी लेट था
कभी मायूस भी था मै
कभी खिलखिला भी था
मेरा भी कोई आया था कभी
कोई गया भी था
ये चेहरे है अलग अलग
मुझे अपने से लगते है
ये चलते फिरते
मुझे मेरे ही किरदार लगते है !

3 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

bahut badiya........pasand aayi mujhe.....

बेनामी ने कहा…

kaamal ka likha hain tune,keep it up!

Unknown ने कहा…

bahut hee achha mujhe yeh kirdaar apne sa lage..