रविवार, 31 जनवरी 2010

Ujala

हज़ारों चिराग जले
उजाला फिर भी न रहा
वहां अँधेरा है ,
फिर भी रौशनी क्यों है
मेरे घर के आँगन में
ठंडी हवा तो चलती है
फिर भी इस ज़हन में मेरे
इतनी तपिश सी क्यों है
नींद तो सब लेते है
कि कुछ आराम मिले
उठता हूँ सो कर
तो थक जथा हूँ मै

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