कैसे कहूँ
जान पाया हूँ ज़िन्दगी को कुछ
कैसे कहूँ
क्या बचपन जिया था
जो आ गयी जवानी
क्या दिल से कुछ कही थी
जो दिल ने न मानी
खुद की आवाज़ भी सुन नहीं पाया कभी
कैसे कहूँ
बिना बात माथें की इन सिलवटों में
चेहरे की रंगत को छन से उडाया
खुल के कभी बात खुद से नहीं की
खुद से क्यों करता रहा हूँ दिखावा
खो ही गया हूँ मै उलझन में अपनी
आँखें खुली है कुछ दिख न पाया
कैसे कहूँ
तमन्ना है मेरी कि सब कुछ मै पा लूँ
चाहता हूँ उसको क्यों
जो मिल न पाया
कैसे कहूँ
रंगों की दुनिया में जीता रहा मै
आँखों में रंग थे
समझ क्यों न पाया
1 टिप्पणी:
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