सदियों से बीतता आया वक़्त
न हुआ किसी का , न होगा ,
न थमा किसी के लिए , न थमेगा,
फिर भी पूछे जाते है लोग
परेशां अपनी जिंदगी से ,
क्या बजा है ,
नौ, दस, ग्यारह , बारहं
आज भी, कल भी , हर रोज़ वही
कुछ पाना है , कुछ ढूड़ना
कुछ खोजना , कुछ खोना
पर नहीं निकल पाते ,
अपने लिए कुछ भी वक़्त ,
घर की दीवार पर टँगी घड़ी
अब तस्वीर सी लगती है,
हर रोज़ वही होता है
जो होता आया सदियों से ,

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