जिन्हें मै जनता था
सब मुझे अपने ही लगते थे,
पर अब जो अपने है
शायद उन्हें मै जनता नहीं ,
अपनी ही समझदारी से
पाले है सरे दर्द मैंने ,
न होते ज़ख़्म मेरे
गर उन्हें मै पालता नहीं ,
लाके खुद ही पटके है
सब फैसले तकदीर पर ,
मिले सब कुछ यहाँ नसीब से
मै मानता नहीं,
जी रहा हूँ मौत को
इन धडकनों के साये में ,
ज़िन्दगी जीने का कोई
वादा और कसम तो नहीं ,
ये तो लोगों का है भरम
नसीब की लकीर सबके हाथ में ,
नसीब तो उनके भी होते है
जिनके हाथ नहीं !
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