मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

meri chahat


पलकों को खोलूं तो 
मन को टटोलूं तो
दिन के उजाले में, हर वक़्त अँधेरा है
चंदा की चांदनी है, तारों का घेरा है
चकोर की चाहत में मौत का बसेरा है
मेरी भी चाहत का प्यार मुझको मिल जाये 
वर्ना इस दिल कि ना धड़कन ना चेहरा है 
मेरी भी चाहत की मौत अगर मंजिल है
परवाह नहीं मुझको, मौत मेरी साहिल है
एक बार आकर वो झूट भी ये कह दे कि
सीनें में उसके जो हर वक़्त धड़कता है
धड़कन वो मेरी है वो दिल भी मेरा है 

kal

कल कल में न मिला प्यार हमारा हमको
कल कल के लिए हम कल को खो बैठे
आये थे कितने कल 
और आज बनकर चल दिए 
पर हम तो अपने कल पर 
आज भी अटल हैं 
चाहा था उन्हें कल 
बोलेंगें उन्हें कल 
पर अब तो क्या बताएं 
ना हमने कही बात 
ना वो ही हमसे बोले 
हम  आज सोचते हैं 
वो बीते कल कि बातें 
कल फिर वही सोचेंगे
जो आज सोचते हैं 

gham

जीना हो गर यार मेरे
तो ग़म की क्यों हम बात करें 
उस चीज़ को तुम अपनालो 
हर ग़म को ख़ुशी बनालो 
ख़ुशी तो है मेहमान मेरी 
ग़म तो मेरा अपना है 
वो आती है  चली जाती है 
ये साथ मेरे ही रहता है 
ग़म को छोड़ कर 
हम ख़ुशी के पीछे क्यों भागें 
कल फिर से उस ख़ुशी को 
ग़म में बदल जाना है 

zra mushkil

समझाना आसान है
समझना ज़रा मुश्किल
कहना आसान है
करना ज़रा मुश्किल
पाना आसान है
संभालना ज़रा मुश्किल
इस मुश्किल सी दुनिया में
सिर्फ अपने नज़रिए से
दूसरों के लिए हर चीज़ आसान है
पर अपने लिए ज़रा मुश्किल

kuch bhi nahi

ज़िन्दगी को हँस के मै जीने चला था 
पर मिला क्या ज़िन्दगी से 
कुछ भी नहीं, 
मुझको जीने के लिए 
ज़रुरत थी ताज़ा हवा कि 
ढूंड आया बाज़ार सारे 
पर मिला क्या 
कुछ भी नहीं ,
मैंने भी मांगी खुदा से 
दर पे जाकर ये दुआ 
मुझको भी झोली में देदे 
तू ख़ुशी के चार दिन 
हा हा हा ..........
पर मिला क्या 
कुछ भी नहीं