पलकों को खोलूं तो मन को टटोलूं तो दिन के उजाले में, हर वक़्त अँधेरा है चंदा की चांदनी है, तारों का घेरा है चकोर की चाहत में मौत का बसेरा है मेरी भी चाहत का प्यार मुझको मिल जाये वर्ना इस दिल कि ना धड़कन ना चेहरा है मेरी भी चाहत की मौत अगर मंजिल है परवाह नहीं मुझको, मौत मेरी साहिल है एक बार आकर वो झूट भी ये कह दे कि सीनें में उसके जो हर वक़्त धड़कता है धड़कन वो मेरी है वो दिल भी मेरा है |
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