मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

gham

जीना हो गर यार मेरे
तो ग़म की क्यों हम बात करें 
उस चीज़ को तुम अपनालो 
हर ग़म को ख़ुशी बनालो 
ख़ुशी तो है मेहमान मेरी 
ग़म तो मेरा अपना है 
वो आती है  चली जाती है 
ये साथ मेरे ही रहता है 
ग़म को छोड़ कर 
हम ख़ुशी के पीछे क्यों भागें 
कल फिर से उस ख़ुशी को 
ग़म में बदल जाना है 

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