तो ग़म की क्यों हम बात करें
उस चीज़ को तुम अपनालो
हर ग़म को ख़ुशी बनालो
ख़ुशी तो है मेहमान मेरी
ग़म तो मेरा अपना है
वो आती है चली जाती है
ये साथ मेरे ही रहता है
ग़म को छोड़ कर
हम ख़ुशी के पीछे क्यों भागें
कल फिर से उस ख़ुशी को
ग़म में बदल जाना है
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