वही है सब कुछ
जो दिखाई नहीं देता
मैंने देखा है उस वृक्ष को
फैली है, जिसकी लताएं खुले आकाश में
लहराते, नाचते पत्ते ठंडी खुश्क हवा के साथ में
मुस्कुराते फूल सूरज की मीठी किरणों में
सब दिखाई देता है
नहीं देखती वो जडें
जो देती है जीवन उस वृक्ष को
जो छिपी रहती है, प्रथ्वी के समीप
थामे हुए उस वृक्ष को
वैसा ही है मेरा जीवन
जो दिखता है
खले आकाश में फैली वृक्ष की उन लताओं के जैसा
जो दिखता है
धुप की किरणों में मुस्कुराते फूल के जैसा
जो दिखता है
खुली हवा में लहराते , झूमते ,नाचते उन पत्तों के जैसा
नहीं दिखती तो
मेरे मन की आत्मा
मेरा सच्चा परमात्मा
जो है उस जड़ के जैसा
जो दिखाई नहीं देता
पर है
जिसके बिना मै कुछ नहीं
मेरा जीवन , मेरी इच्छाएं , मेरा अस्तित्व नहीं
मै वही हूँ जो दिखता नहीं

