बुधवार, 27 जुलाई 2011

WAHI HAI SACH JO DIKHTA NAHI

जो दिखता है हमें , नहीं है कुछ भी 
वही है सब कुछ 
जो दिखाई नहीं देता
मैंने  देखा है उस वृक्ष को 
फैली है, जिसकी लताएं  खुले आकाश में 
लहराते, नाचते पत्ते ठंडी  खुश्क हवा के साथ में 
मुस्कुराते फूल सूरज की मीठी किरणों में 
सब दिखाई देता है 
नहीं देखती वो जडें 
जो देती है जीवन उस वृक्ष को
जो छिपी रहती है, प्रथ्वी के समीप 
थामे हुए उस वृक्ष को 
वैसा ही है मेरा जीवन 
जो दिखता है 
खले आकाश में फैली वृक्ष की उन लताओं के जैसा 
जो दिखता है 
धुप की किरणों में मुस्कुराते फूल के जैसा 
जो दिखता है 
खुली हवा में लहराते , झूमते  ,नाचते उन पत्तों के जैसा
नहीं दिखती तो  
मेरे मन की आत्मा
मेरा सच्चा परमात्मा 
जो है उस जड़ के जैसा 
जो दिखाई नहीं देता 
पर है 
जिसके बिना मै कुछ नहीं 
मेरा जीवन , मेरी  इच्छाएं , मेरा अस्तित्व नहीं 
मै वही हूँ जो दिखता नहीं 


शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

Har roz wahi hota hai

सदियों से बीतता आया वक़्त 
न हुआ किसी का , न होगा ,
न थमा किसी के लिए , न थमेगा, 
फिर भी पूछे जाते है लोग 
परेशां अपनी जिंदगी से ,
क्या बजा है ,
नौ, दस, ग्यारह , बारहं
आज भी, कल भी , हर रोज़ वही 
कुछ पाना है , कुछ ढूड़ना
कुछ खोजना , कुछ खोना 
पर नहीं निकल पाते ,
अपने लिए कुछ भी वक़्त ,
घर की दीवार पर टँगी घड़ी
अब तस्वीर सी लगती है, 
हर रोज़ वही होता है 
जो होता आया सदियों से ,

kuch bhi nahi

जिन्हें मै जनता था 
सब मुझे अपने ही लगते थे, 
पर अब जो अपने है 
शायद उन्हें मै जनता नहीं ,
अपनी ही समझदारी से 
पाले है सरे दर्द मैंने ,
न होते ज़ख़्म मेरे 
गर उन्हें मै पालता नहीं ,
लाके खुद ही पटके है 
सब फैसले तकदीर पर ,
मिले सब कुछ यहाँ नसीब से 
मै मानता नहीं,
जी रहा हूँ मौत को 
इन धडकनों के साये  में ,
ज़िन्दगी जीने का कोई 
वादा और कसम तो नहीं ,
ये तो लोगों का है भरम 
नसीब की लकीर सबके हाथ में ,
नसीब तो उनके भी होते है 
जिनके हाथ  नहीं !

बुधवार, 1 जून 2011

dil ki soch

मै अब वो लिख नहीं पाता हूँ 
जो कुछ मै सोचता हूँ 
मै अब जो सोचता हूँ 
उसमें कुछ शब्द नहीं होते 
कुछ ऐसी सांसें है मेरी 
जो दिल को दर्द देती है
दिल तो जनता है 
पर बोल नहीं है उसके 
मै उसको याद करके जब कभी कलम उठता हूँ 
मेरी कलम के शब्द मेरी आँखों से टपक जाते है 

रविवार, 6 मार्च 2011

kaise kahun

कैसे कहूँ 
जान पाया हूँ ज़िन्दगी को कुछ 
कैसे कहूँ 
क्या बचपन जिया था 
जो  आ गयी जवानी 
क्या दिल से कुछ कही  थी 
जो दिल ने न मानी 
खुद की आवाज़ भी सुन नहीं पाया कभी 
कैसे कहूँ 
बिना बात माथें  की इन सिलवटों में 
चेहरे की रंगत को  छन से उडाया
खुल  के कभी बात खुद से नहीं की 
खुद से क्यों करता रहा हूँ दिखावा 
खो  ही गया हूँ मै उलझन में अपनी 
आँखें खुली है कुछ दिख न पाया 
कैसे कहूँ 
तमन्ना है मेरी कि सब कुछ मै पा लूँ 
चाहता हूँ उसको क्यों 
जो मिल न पाया
 कैसे कहूँ 
रंगों की दुनिया में  जीता रहा मै 
आँखों में रंग थे
 समझ क्यों न पाया