शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

yadeen

यादें तो कुछ ऐसी है
हर मौसम के जैसी है
कभी देती है दर्द
तो कभी बरस पड़ती है आँखों से
कभी देती है तपिश
तो सहम जाता हूँ मै
कभी पतझड़ के पत्तों की  तरह
बिखर जाती है सीने में
ये यादें आती  ही क्यों है
दर्द ये दिल का बढाती क्यों है
आग सीने में लगाती क्यों है
मेरे भूले से भी न भूलें है
मेरे अश्कों को बढाती क्यों है
कभी सताती है
कभी रुलाती है
कभी चेहरे पर मुस्कुराहट ले आती है
दर्द और ख़ुशी का अहसास दिलाती है
यादें तो कुछ ऐसी है
हर मौसम के जैसी है

sapne

छोड़ आया हूँ उन सबको
जो भी थे अपने
क्योंकि मैंने पाले थे
अपने कुछ सपने
इस अंजाने शहर से
मुझको डर लगता था
क्योंकि इसकी गलियों से
मै वाकिफ़ न था
बीत गये कुछ साल भी अब तो
क्या बतलाऊँ
मैंने क्या खोया क्या पाया
क्या बतलाऊँ
ठान लिया मैंने अब तो
दिल मै अपने
कैसे न पूरे होंगे
मेरे ये सपने
महनत और किस्मत का है
अब खेल ये सारा
महनत अपने हाथ में
और किस्मत का सहारा
दोनों हो गर साथ में
तो किस बात का डर है
वरना क्या बतलाऊँ
क्या जीता क्या हारा

बुधवार, 23 सितंबर 2009

kaise maan jayen

साथ तो रहे वो, बरसों से हमारे
उसने भी हमको परखा
हमने भी उनको परखा
शिकवे हमे भी कुछ थे
थे उनको कुछ गिले भी
न हमने सुनी उनकी
न उसने हमने पूछा
पर एक दिन अचानक वो छोड़ गये हमको
कहता था कोई हमसे
वो परेशां बहुत है
जो बरसों साथ में थे
थे इतने गिले शिकवे
दूर हो के हमसे
वो पास भी न आये
हम कैसे मान जाएं
वो परेशां बहुत है

सोमवार, 21 सितंबर 2009

khushi

क्यों लगता है ऐसा मुझको
सब कुछ खो दिया मैंने
जिसे पा कर ही पैदा हुआ
कभी खोया नहीं मैंने
जिसे चाह कर भी कभी
खो नहीं सकता हूँ मै
जिसे खोने के लिए
कोई उपाए ही नहीं है
ख़ुशी जो लेके आया था
जो हर दम साथ मेरे है
वो तो मेरे ही अन्दर है
बाहर क्यों ढूँढता उसको
पर अब तो लगता है ऐसा
मुझे दुःख की  ज़रुरत है
उसी को पास रखता हूँ
उसी के साथ रहता हूँ
उसी से भागता हूँ मै
ख़ुशी को ढूँढता हूँ मै
ख़ुशी को ढूँढने में दिन ब् दिन
दुःख पा लिए मैंने
ख़ुशी तो साथ मेरे थी
दुःख अपना लिए मैंने

रविवार, 20 सितंबर 2009

Jhooth

झूठ ही मेरा जीवन है ,झूठ मेरा संसार है
झूठ ही मेरे अन्दर है ,झूठ ही मेरे बाहर है
छीन लिया गर झूठ को मुझसे
जी ही नहीं मै पाऊंगा
बना चुका हूँ अपना जीवन
बिन इसके मर जाऊंगा
गर सोचूं ये झूठ है क्या
अंहकार का नाम है
सच तो सचमुच कड़वा है
झूठ ही मीठा पान है
हर दुःख से बच जाता हूँ
झूठ जहाँ ले आता हूँ
बना लिया है झूठ को जीवन
समझ नहीं मै पता हूँ
समझ नहीं मै पता हूँ

meri zindagi

मेरी ज़िन्दगी के बारे में मुझसे न पूछो मेरे दोस्त

तेरी और मेरी ज़िन्दगी में
फर्क है तो सिर्फ इतना
तू अपने ढंग से जीता है
मै अपने ढंग से जीता हूँ

Farq

जबां क्या कहती है
ये तो दिल ही जानता है
दिमाग क्या सोचता है
ये भी दिल ही जानता है
दिल और दिमाग में
फर्क है सिर्फ दो फांसलों का
फिर क्यों सोच में
ज़मीं आसमां का फर्क होता है
बुरा करता हूँ तो कोई कदम
दिल से नहीं उठता
भला करने को ये दिल
हर तरह तैयार रहता है

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

Dar lagta hia

खेलो रंगों से होली, प्यार हर रंग में होता है
न खेलो खून की होली , बहुत डर लगता है
चलाओ रोज़ पटाखे, मनाओ रोज़ दिवाली
न मारो बम के तुम गोले , बहुत डर लगता है

aisa kyon hota hai

ऐसा क्यों होता है
कि कोई देश पर मर मिटने के लिए अपनी तमन्नाओं को  ख़त्म कर देता है
तो कोई अपनी तमन्नाओं को पूरा करने के लिए देश को ख़त्म करने में लगा है
ऐसा क्यों होता है
कि कुछ लोग हमारे लिए मर जाते है (यानि हमारे देश के सिपाही )
और हम सिर्फ अपनी खुशियाँ में  ढूंढने में  लगे रहते है

कितनी खूबसूरत थी ये दुनिया
न जाने कौन इसे बांटने में  लगा है

ना बनते तोप के गोले तो कितना अच्छा था
ना होती बंदूकों की सलामी तो कितना अच्छा था

काश के उड़ता आज़ाद पंछी की तरहं इस दुनिया में मै
होते फूल ही फूल दुनिया में  तो कितना अच्छा था

ऐ खुदा दे दे वो होसला मुझको
कि  सरहद के पार भी प्यार भर आऊं मै

Maksad


जीने को ज़िन्दगी जिए जाते है हम
नहीं जानते है मकसद, फिर भी चले जाते है हम
ज़िन्दगी चलाने के लिए मकसद खोज लेते है खुद
फिर उस पर अपनी मर्ज़ी से चले जाते है हम
क्यों होता है ऐसा
हर उम्र का एक मकसद ढूंढ़ लेता हूँ मै
बचपन में खिलोने
जवानी में  इश्क
और अब पैसा और शौहरत
क्या ढूंढ़  रहा हूँ इस ज़िन्दगी में
नहीं जनता हूँ मै
गर सोचता हूँ तो बहुत डर जाता हूँ
कही मौत ही मेरी ज़िन्दगी का मकसद तो नहीं
कही रोज़ उसी कि तलाश में तो नहीं निकल पड़ता हूँ मै!

ye kaisa insaan hai

जो जन्मा नहीं वो इंसा है
जो जनम लिया शैतान है
जो मरा  नहीं वो मतलब से
यहाँ मरा हुआ ही महान है
जो जन्मा नहीं
जो मर है गया
ना वो हिन्दू है
ना मुसलमान है
जब जन्म मरण यहाँ निश्चित है
तो इंसा क्यों हैवान है
अच्छा है जाना मुश्किल है
इस धरती से उस अम्बर तक
जब बाँट दिया इस धरती को
तो अम्बर का क्या मान है

khawab


मै जीता हूँ
बस उस पल को
जो आता है पल हर पल में
जो बीत गया पल
ख्वाब ही था
आने वाला पल
ख्वाब ही है
ख्वाबों की  इस दुनिया में
पल पल का जीना ख्वाब ही है
गर सोचूं
ये ज़िन्दगी है क्या
यूँ भी तो एक ख्वाब ही है 

Katputliyan

तू ही बनाता  है दुनिया
तू ही मिटाता है
ये कैसा तेरी ज़िन्दगी का खेल है
तू ही बनाता  है पटरी
तू ही चलाता है
ये कैसी मेरी ज़िन्दगी की रेल है
सच भी गर  तेरा है
और झूट भी तेरा
तो क्यों नहीं इन दोनों का कोई मेल है
जब हिलता नहीं तेरी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी यहाँ
तो फूल क्या , कांटें भी क्या, और मै भी क्या
दुनिया है क्या मुझको अब समझ आया
तेरे लिए कटपुतलियों का खेल है 

बुधवार, 16 सितंबर 2009

naam

नाम की क्या बात करें
नाम का ही नाम है
मुझसे मेरा नाम नहीं
नाम से मेरा नाम है
ग़म का भी नाम है
ख़ुशी का भी नाम है
फूलों का भी नाम है
काँटों का भी नाम है
दोस्त का भी नाम है
दुश्मन का भी नाम है
नाम एक अहसास है
अहसास का भी नाम है
जिस्म तो मेरा मिटटी है
मिटटी में मिल जाएगा
जीना है तो नाम से जी
अमर जहाँ में नाम है 

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

chehra

चेहरों के यहाँ हैं रूप कई
चेहरे में चेहरा लिपटा हुआ
कुछ बेरंगे
कुछ रंंगे हुए
कुछ सहमे से
कुछ डरे हुए
कोई सोच में है
कोई परेशान
कोई थका हुआ
कोई बेजान
कैसे हैं ये चेहरों के रंग
चलते है फिर भी संग संग
एक चेहरा ऐसा मिल जाए
जिसे देख के कलियाँ खिल जाएँ
रोए तो पत्ते झड़ जाये
वो हसें तो परियां शर्मायें
बस एक बार वो मिल जाए
बस एक बार वो मिल जाए

सोमवार, 14 सितंबर 2009

Achcha nahi lagta

अच्छा नहीं लगता
सिलवट लिबाज़ में 
फिर भी भरी हैं सिलवटें
तमाम रूह में
अच्छा नहीं लगता
जलील कोई भी करे
किया कुछ भी न ऐसा
कि फक्र कोई  कर सके
अच्छा नहीं लगता
कि दर्द कोई दे मुझे
काबिल नहीं उसके
कि प्यार कोई कर सके

शनिवार, 12 सितंबर 2009

Kuch Nya

हर दिन नया लगता है
हर रात नई लगती है
हर वक़्त नया लगता है
हर बात नई लगती है
हर दिन नई ख़ुशी,हर दिन नया ग़म
हर दिन नई सांस ,हर दिन नई धड़कन
हर दिन नई धूप,हर दिन नया रूप
हर दिन नई कली,हर दिन नया फूल
हर दिन नई सोच ,हर दिन नई खोज
फिर भी कहते है लोग
कुछ तो नया चाहिए