गुरुवार, 17 सितंबर 2009

Maksad


जीने को ज़िन्दगी जिए जाते है हम
नहीं जानते है मकसद, फिर भी चले जाते है हम
ज़िन्दगी चलाने के लिए मकसद खोज लेते है खुद
फिर उस पर अपनी मर्ज़ी से चले जाते है हम
क्यों होता है ऐसा
हर उम्र का एक मकसद ढूंढ़ लेता हूँ मै
बचपन में खिलोने
जवानी में  इश्क
और अब पैसा और शौहरत
क्या ढूंढ़  रहा हूँ इस ज़िन्दगी में
नहीं जनता हूँ मै
गर सोचता हूँ तो बहुत डर जाता हूँ
कही मौत ही मेरी ज़िन्दगी का मकसद तो नहीं
कही रोज़ उसी कि तलाश में तो नहीं निकल पड़ता हूँ मै!

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