तू ही बनाता है दुनिया
तू ही मिटाता है
ये कैसा तेरी ज़िन्दगी का खेल है
तू ही बनाता है पटरी
तू ही चलाता है
ये कैसी मेरी ज़िन्दगी की रेल है
सच भी गर तेरा है
और झूट भी तेरा
तो क्यों नहीं इन दोनों का कोई मेल है
जब हिलता नहीं तेरी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी यहाँ
तो फूल क्या , कांटें भी क्या, और मै भी क्या
दुनिया है क्या मुझको अब समझ आया
तेरे लिए कटपुतलियों का खेल है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें