शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

sapne

छोड़ आया हूँ उन सबको
जो भी थे अपने
क्योंकि मैंने पाले थे
अपने कुछ सपने
इस अंजाने शहर से
मुझको डर लगता था
क्योंकि इसकी गलियों से
मै वाकिफ़ न था
बीत गये कुछ साल भी अब तो
क्या बतलाऊँ
मैंने क्या खोया क्या पाया
क्या बतलाऊँ
ठान लिया मैंने अब तो
दिल मै अपने
कैसे न पूरे होंगे
मेरे ये सपने
महनत और किस्मत का है
अब खेल ये सारा
महनत अपने हाथ में
और किस्मत का सहारा
दोनों हो गर साथ में
तो किस बात का डर है
वरना क्या बतलाऊँ
क्या जीता क्या हारा

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